अधूरा सपना
रात मा सोए गयुं थक के तो देखूं सपना
कोऊ पहनाए देहिस ताज मुरे मुड़वा पर
आई आवाज़ कि उठ भाग तेरा जागा है
आज से शहरे सुखन का तू महाराजा है
बात यह सुनते ही फूटन लगे लड्डू मन मा
मोरा अभिमान निहारे था मोहे दर्पण मा
पाँव धरती पे थे आकाश पे मनवा पहुँचा
उड़ के मैं अपने विचारों से गगन्वा पहुँचा
मीर व ग़ालिब नज़र आए मुझे बौना जैसे
और इक़बाल मियां होएं खिलौना जैसे
मेरी आशाओं के खिल उट्ठे कमल चारों ओर
आर्जूओं से सजे शीश महल चारों ओर
खोये औसान जो सपनों कि बयरयापी के
जो हितैषी थे नज़र आए वही दुश्मन से
अपने हाथों से चमन अपना उजड़वाये दियुं
जितने साथी रहे अपने उन्हें ठुकराए दियुं
अब वही छोटे लगन लागे बरोबर जो रहें
कुछ अनाड़ी से नज़र आए सुखनवर जो रहें
हाँ हुजूरी जो करे कोई तो आनंद आए
बात सच्ची जो सुनूँ मैं तो जिया घबराए
जी यह चाहे कोई साहित्य का अवतार कहे
और कोई मुझ को सुखनवर कहे फ़नकार कहे
दिन भवा ईद तो हर शब शबे बारात भई
मेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ ही हर एक बात भई
मैं बहुत खुश था सदा के लिए आराम मिला
मुझ को इज्ज़त मिली शोहरत भी मिली नाम मिला
मन था प्रसन्न कि इतने में मुक़द्दर फूटा
वक्त कि खा के चपत ऐश का सपना टूटा
आँख खुलते ही मेरा दिल हुआ तस्वीरे अलम
फिर वही मैं था वही हाथ में सेठे का क़लम
अब न वो ताज न वो तख्त न बाजे गाजे
मंत्री जो रहें सपने में वो जोकर लागे
कोई साथी कोई हमदम न कोई हमसाया
मैं ने अपने को ज़माने में अकेला पाया
दूर तक कोऊ नज़र आया न पूरब पछिम
एक वाणी सी पड़ी कान मे मद्धम मद्धम
इसी कारन तो कत्ले आशिकां से मना करते थे
अकेले फिर रहे हो यूसुफे बेकारवां हो कर
mehek said,
December 25, 2007 at 6:19 am
this was realy superb,sapna,kavi kehlane ka,shohrat pane ka.
mehek said,
December 25, 2007 at 6:21 am
this was realy superb,sapna kavi banneka,shorat pane ka.
انور رشيد ھاشمی said,
January 12, 2008 at 7:07 am
اب نہ تقرير کی ضرورت ھے
اور نہ تحرير کی ضرورت ھے
آج کے دور کربلائ ميں
عزم شبّير کی ضرورت ھے