About Sahir (साहिर के बारे में)
साहिर की शाएरी दिमाग की नहीं दिल की शाएरी है , मंजूमात (नज़्में) हों या गज़ल्यात (ग़ज़लें), क़तआत हों या रुबाइयात , दिल की शाएरी उनके एक जुमले में नहीं, लफ्ज़ लफ्ज़ में जल्वागर है साहिर साहब ने जिन अस्नाफे शाएरी को छुआ है उन में आगही के साथ साथ वारफ्त़गी और वाल्हाना पन दर आया है उनकी शायरी बंधे टिके रिवायती अस्लूब से बड़ी हद तक मुन्फरिद है मुस्तकि़ल फिक्र और मश्के सुखन ने उन्हें बाकमालाने अदब की साफ में जगह दी है
(अल्लामा साकि़ब कानपुरी : नकीबे खुदी १९८१)
साहिर साहब एक मुख्लिस (शुद्ध) इन्सान, एक सच्चे दोस्त और एक अच्छे शाएर हैं वह सादा और बेतकल्लुफ अल्फाज़ व अंदाज़ में शानदार और जानदार ख़यालात (विचार) पेश करने में फ़्नकाराना महारत रखते हैं येही मुन्फरिद (विरला) अंदाज़ तो उनकी शाएरी का कमाल है साहिर साहब ने “कागज़ पे रख दिया है कलेजा निकाल के”
(अल्लामा तैश सिद्दीकी: नकीबे खुदी १९८१)
मौलन अबुल्कलाम आज़ाद की नस्र और अल्लामा इक़बाल की नज़्म का तास्सुर जिन लोगों ने कुबूल किया उन में से एक साहिर हाशमी भी हैं. साहिर हाशमी इकबाल स्कूल के शाएर हैं वो इस बात से वाकिफ़ हैं कि खुदी कि तारीफ में ख़ुद आग्ही, ख़ुद शनासी, ख़ुद फ़हमी, ख़ुद बीनी, ख़ुद गरी, ख़ुद अफ़रोजी, ख़ुद एत्मादी, ख़ुद आराई तो आती है लेकिन ख़ुद नुमाई, ख़ुद सताई, ख़ुद पसंदी, ख़ुद सराई की कोई गुंजाइश नहीं यह फलसफा बेखुदी व ख़ुद फरामोशी की इजाज़त तो देता है मगर किसी क़ीमत पर भी ख़ुद फरोखतगी, खुद्फरोशी की नहीं . साहिर साहब इस फलसफे के जानकर हैं और इस के असरात इनके कलाम पर नुमायां हैं
(अल्लामा रशीद क़मर लखनवी: नकीबे खुदी १९८१)
अनवर रशीद हाशमी said,
December 16, 2007 at 4:08 pm
साहिर साहब की शेरगोयी मक़सदियत की आइनादार है, साहिर साहब की फिकरी सलाहियतों का एतराफ़ करने में कोई झिझक महसूस नहीं होती है। साहिर साहब का मक़सद-ए- शेरगोयी क्या है, इस मक़सद की रफ़अत व अज़मत का मोतरिफ़ होने के लिये साहिर साहब का एक क़तआ बहुत काफ़ी है।
अब ना तहरीर की ज़रुरत है, और न तक़रीर की ज़रुरत है।
आज के दौर-ए करबलाई में, अज़्म-ए शब्बीर की ज़रुरत है ।।
(अल्लामा अनवर साबरी : नकीबे खुदी १९८१)
انور رشيد ھاشمی said,
January 9, 2008 at 12:36 pm
حمد با رئ تعالی
حضرت ساحر ھاشمی اديب
(ذ کر ھا د ی و ھد ا يت)
ميں گداۓ بے نوا ھوں تو خداۓ د و جہاں ھے
مرے حال پر نظر کر ميری زندگی فغاں ھے
کہيں گرد ش قمر ھے کہيں رقص کہکشا ں ھے
تری عظمتوں کا مظہر يہ بلند آسما ں ھے
تو وہاں بھی ضوفگن ھے نہ جہاں خيال پہونچے
ھے مکيں د لوں ميں پھر بھی تری ذات لامکاں ھے
کوئ کيا سمجھ سکے گا تری مصلحت جہاں ميں
کہيں د ور تک ھے صحرا کہيں گل ھيں گلستا ں ھے
جو اٹھے ترے مقابل وہ جہاں سے مٹ گۓ ہيں
کوئ نا م ھے نہ باقی نہ کہيں کوئ نشا ں ھے
ھوں غلام يا کہ آقا ھيں ترے لۓ برابر
ھوں فقير يا تونگر تؤ سبھی پہ مہرباں ھے
ميں تری پناہ ميں ھوں مرا ناز حق بجا نب
تری رحمتوں کا يا رب مرے سر پہ سا ئبا ں ھے
ترے نام پہ مٹا جو وھی ساحر حزيں ھوں
مرے مرتعش لبوں پر غم دل کی داستاں ھے