फिर कभी सुनाऊंगा ग़ज़ल
आज इसरार न कर आज तो मजबूर न कर
फिर कभी ऐ मेरे हमदम मैं सुनाऊंगा ग़ज़ल
यह नहीं वक्त मोहब्बत के तरानों के लिए
हुस्न और इश्क से मामूर फसानों के लिए
फन मेरा वक्फ है पुरजोश बयानों के लिए
मेरे अशआर हैं भारत के जवानों के लिए
आज खतरे में वतन है तुझे मालूम नहीं
बर्क की ज़द में चमन है तुझे मालूम नहीं
वह हिमाला की तरफ अजनबी शैतान बढे
रोंदते पैर तले बाहमी पैमान बढे
दुश्मने दीन बढे गारत गरे इमान बढे
जिन से शर्माएं दरिंदे भी वो इन्सान बढे
आज भारत को है हम सब की ज़रूरत ऐ दोस्त
अव्वलीं फर्ज़ वतन की है हिफाज़त ऐ दोस्त
मुल्क खतरे में है इस वक्त हमारा दौड़ो
मोड़ने के लिए तूफान का धारा दौड़ो
जज्बये हुब्बे वतन ने है पुकारा दौड़ो
मादरे हिंद बुलाती है खुदारा दौड़ो
शेर दिल टीपू की तारीख को दुहराना है
हम को नामूस वतन के लिए मर जाना है
राम और कृष्ण की अज़मत की क़सम खा के बढो
भीम व अर्जुन की शुजाअत की क़सम खा के बढो
लक्ष्मी बाई की जुर्रत की क़सम खा के बढो
अपने नामूस की गैरत की क़सम खा के बढो
दिल में यह अज्म हो जां तन में रहे या न रहे
हाँ मगर कोई भी दुश्मन सरे नेफा न रहे
mehek said,
December 25, 2007 at 6:22 am
dil ko chu liya