मुशाएरे से वापसी

                मुद्दतों याद आए जो उस बात का ये ज़िक्र है
                जनवरी की एक ठंडी रात का ये ज़िक्र है
एक कालेज में सजी थी महफिले शेरो सुखन
जलवा फ़रमा थे वहाँ अहले नज़र अरबाबे फन
               कोहना मश्क़ उस्ताद भी थे और थे कुछ मुब्तदी
               शायेराने खुश गुलू भी, और तह्तुल  लफ्ज़ भी
कुछ तो नज़्में और कुछ ग़ज़लें सुनाने आए थे
और कुछ अपने गले को आज़माने आए थे
                तालिबाने इल्म भी सामे थे वां तज्जार भी
                फ़ाका़ कश मज़दूर भी, बेकार भी, ज़रदार भी
अपनी शादां ज़िंदगी पर कुछ थे इतराए हुए
और कुछ थे बीबियों की झिड़कियां खाए हुए
                बन के माजूने मुरक्कब सामयीने ज़ी व्क़ार
                शाएरों को देखते थे सर से पा तक बार बार
रूए ज़ेबा पर किसी शाएर के कोई खंदाज़न
और कोई उलझे हुए बालों पे मसरूफे़ सुखन
                मल्गुजी सी शेरवानी पर किसी को एतराज़
                 सिर्फ़ ऐनक की कमानी पर किसी को एतराज़
अल्गरज़ जितने थे मुंह उतनी ही बातें थीं वहाँ
इतने में एक शोर सा बाहर से उटठा नागहां
               यह हुआ मालूम के आते हैं सदरे मोहतरम
                हर निगाहे मुन्तज़र बिछने लगी ज़ेरे क़दम           
सद्र साहब कौन थे क्या थे ज़रा सुन लीजिए
नाज़िमे महफिल को फिर दादे ज़िहानत दीजिये
               शेरो फ़न से था जनाबे सद्र को इतना लगाओ
               जैसे रेगिस्ताने अफ़्रीका़ हो और गंगा की नाव
उनकी आला का़ब्लियत का येही अफ़साना था
थे बड़े नेता वज़ीरों से बड़ा याराना था
              हो गई जिस पर नज़र परमिट उसे दिलवा दिया
              और हुए नाराज़ तो खेत और घर जलवा दिया
आज कल ये खूब्याँ काफ़ी हैं इज्ज़त के लिए
महफिलों में और जलसों में सदारत के लिए
               यक बयक कुछ अर्ज़ की नाजि़म ने बढ़ कर सदर से   
               लम्बी लम्बी वो डकारें ले के मसनद से उठे
चन्द अल्फाज़ इफ्तिताही सदर साहब ने कहे
और हुआ इरशाद  कि अब कोई शाएर कह चले
              एक न्हीफो नातवां शाएर पये आगाज़ उठा
              हुस्न कि रानाइयों का ह्म्दमो हमराज़ उठा
था अधूरा ही अभी मिस्रा कि आई ये सदा
कोई इस शाएर को बढ़ के दे दे आएइना ज़रा
               कोई बोला घर से पिट कर आए हैं हज़रत यहाँ
               कोई ये कहने लगा दुम रह गई आख़िर कहाँ
हौसलामंदी से शाएर ने पढ़े अशआर कुछ
सुन ने वालों ने भी आवाजे कसे हर बार कुछ
               छोड़ दी बेचारे शाएर ने गज़ल भी ना तमाम
               और नाज़िम ने पुकारा दूसरे शाएर का नाम
बैठ कर उसने तरन्नुम से ग़ज़ल छेड़ी ही थी
हर तरफ तबले की थापों की सदा उठने लगी
              पढ़ के मक्ता सामने से उठ गया शयेर गरीब
              अब न थी हिम्मत कि आता कोई माइक के क़रीब
खौफ से हूटिंग के नौ आमोज़ जब हटने लगे
मोर्चे पर एक से इक अहले फन डटने लगे
               लैस था कोई रुबाई से कोई क़तआत से
               लेकिन अहले बज़्म थे बेज़ार हर एक बात से
काम आई कुछ न मश्शाकी़ न अंदाज़े बयां 
सुनने वालों ने उड़ा दीं शायरों कि धज्जियाँ
                यह हुई तजवीज़ कि अब ह्ज्ल गो आगे बढ़ें
                अहले महफ़िल को हंसाने के लिए ह्ज़लें पढ़ें
नुस्खा आख़िर था पर फिर भी कुछ आया न काम
शोरो गु़ल में हो गया बज़मे सुखन का इख्तिताम
                हो गए रुख़्सत जनाबे सद्र जब ऐवान से
                शाएरों ने भी संभाले अपने जूते शान से
शायरों से अर्ज़ कि सिक्रेट्री ने , आइये
आप को ज़हमत न हो तो चाए पी कर जाइये
                शाएरों को कुछ पसोपेश और ताम्मुल जब हुआ
                सूरते साएल बना सिक्रेट्री आगे बढ़ा
इल्तिजा की, चंद लम्हों के लिए रुक जाइए
चाय की दावत किसी मुफ़लिस की मत ठुकराइये
                 अब न थी इंकार की जुर्रत किसी शयेर में वां
                 मुतमइन होकर हुए सिक्रेट्री साहब रवां
हाल में एक सिम्त बैठे शाएराने खुश कलाम
मुन्तजिर थे देखए कब दौर में आता है जाम
               एक का घंटा बजा फिर दो वहीं पर बज गया
              चाए भी गायब थी और सिक्रेटरी भी लापता
यह सवाल उठने लगा बैठे कोई कब तक यहाँ
आगये इतने में दो या टिन चपरासी वहाँ
               अर्ज़ की चपरासियों ने हम को छुट्टी दीजये
                अब खुदा के वास्ते ये हाल खाली कीजये
हाल को कर के मुकफ्फ़िल हम को घर जाना भी है
डयुटियों पर कल अंधेरे मुंह हमें आना भी है
               बोल सच्चे थे मगर हर एक को खलने लगे
               हो के आजिज़ माहपाराने अदब चलने लगे
रात भर जागे हुए थे सब थकन से चूर चूर
और कालिज शहर से था कम से कम दो मील दूर
               शाएराने मुक़्तदिर थे तख़ताए मश्के़ सितम
                फिक्र थी सब को येही अब कैसे घर जाएंगे हम
ये न थी मुश्किल कि मौके पर कोई रिक्शा न था
वाय क़िस्मत शायरों की जेब में पैसा न था
                देर तक एक दूसरे का मुंह खड़े तकते रहे
                शान में सिक्रेट्री की कुछ न कुछ बकते रहे
जब न हो पाया सवारी का कोई भी इंतज़ाम
बादले नाख्वास्ता आख़िर हुए म्हवे खिराम
                सर झुकाए ताव खाए मुंह फुलाए चल दिए 
                अपनी मय्यत अपने कांधों पर उठाये चल दिए

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