विकास की राहें
हम अपने खूने दिल से गुलशने वतन सजायेंगे
तरक्कियों की राह पर क़दम बढ़ाए जायेंगे
न भूख प्यास अब कभी लहू हमें रुलाएगी
न कोई बाप रोयेगा न अश्क मां बहाएगी
न कोई गम्ज़दा बहन तड़प के ज़हर खायेगी
रिवाज काम आएगा न रस्म काम आएगी
हर एक घर से लानतें जहेज़ की मिटायेंगे
तरक्कियों की राह पर क़दम बढ़ाए जायेंगे
किसी की बात पर न कोई आस्तीं भिगोएगा
न मुफ़लिसी से कोई भी किसी के ग़म में रोएगा
किसी भी शहर में कोई न अब सड़क पे सोएगा
मकां की जुस्तुजू में अब कोई न होश खोएगा
हर एक खानदान के लिए मकां बनाएंगे
तरक्कियों की राह पर क़दम बढ़ाए जायेंगे
वतन की सरज़मीन पर रहेंगे सब खुशी खुशी
सभी बसर करेंगे अब तो बावकार ज़िंदगी
तरक्कियों की राह पर क़दम बढ़ाए जायेंगे
न छिड़ सके गी बात अब यहाँ तास्सुबात की
भटक न पाएगा यहाँ जिहालतों में अब कोई
कदम कदम प इल्म के चराग़ हम जलायेंगे
तरक्कियों की राह पर क़दम बढ़ाए जायेंगे
असर दिखा रही है अब दुआए अहले गुलसितां
सदा बहार ही रहे न आए मौसमे खिजां
मुसाफ़िरों को फल मिलें तो पंछियों को आस्तां
कड़ी अगर हो धूप तो सरों पे सब के साएबां
दरख्त सैकड़ों हर एक राह पर लगायेंगे
तरक्कियों की राह पर क़दम बढ़ाए जायेंगे
वतन की जो हों आबरू तो कुल जहाँ को नाज़ हो
ज़मीं को जिन पे फख्र हो तो आसमां को नाज़ हो
जो खुश हों अहले गुलसितां तो बागबां को नाज़ हो
वो फूल ऐसे होंगे जिन पे गुलसितां को नाज़ हो
बहारे ज़िंदगी में ऐसे फूल हम खिलाएंगे
तरक्कियों की राह पर क़दम बढ़ाए जायेंगे
न ज़ालिमों के सामने रहेगा कोई सर बखम
न बेकसों पे ढा़ सकेगा अब यहाँ कोई सितम
मिटेगा इक न एक दिन गुरूर शौकतो हशम
कलाइयां फसदियों की बढ़ के तोड़ देंगे हम
बिनाये ज़ुल्म ओ जौर को वतन से हम मिटायेंगे
तरक्कियों की राह पर क़दम बढ़ाए जायेंगे