ज़िन्दाबाद ऐ वतन
ज़िन्दाबाद ऐ वतन ज़िन्दाबाद ऐ वतन
तू ज़माने को अपना बनाता रहे
तुझ से सारा जहाँ फैज़ पाता रहे
मौसमे गुल शबो रोज़ आता रहे
ज़र्रा ज़र्रा तेरे गीत गाता रहे
मुस्कुराते रहें तेरे दश्तो चमन
ज़िन्दाबाद ऐ वतन ज़िन्दाबाद ऐ वतन
तेरी आगोश में सैकडों नद्दियाँ
है हिमालह तेरा हम्सरे आसमां
नेमतें सारे आलम की तेरे यहाँ
तू है अंबर फिशां तू है जन्नत निशां
है निराला जहाँ से तेरा बांकपन
ज़िन्दाबाद ऐ वतन ज़िन्दाबाद ऐ वतन
तेरी मिटटी में चाहत की तासीर है
तेरे बेटों में उल्फत की तनवीर है
अमन की यूं तो हर लब पे तकरीर है
वक्त आए तो हर शख्स शमशीर है
हर तरफ से उठे गी सदाए बज़न
ज़िन्दाबाद ऐ वतन ज़िन्दाबाद ऐ वतन
दिल में साहिर के है बस येही आरजू
ज़िक्र तेरा हो हर दम तेरी गुफ्तुगु
तेरी शोहरत ज़माने में हो चार सू
हिंद वाले जहाँ में रहें सुर्खरू
तेरी यादों से रोशन हो हर अंजुमन
ज़िन्दाबाद ऐ वतन ज़िन्दाबाद ऐ वतन