जाहिल
आकिल है अगर कोई तो आकिल कहिये
कामिल है अगर फन में तो कामिल कहिये
लेकिन यह सुखन याद रहे ए साहिर
जाहिल को न भूले से भी जाहिल कहिये
आकिल है अगर कोई तो आकिल कहिये
कामिल है अगर फन में तो कामिल कहिये
लेकिन यह सुखन याद रहे ए साहिर
जाहिल को न भूले से भी जाहिल कहिये
champak said,
December 1, 2009 at 2:24 pm
वाह क्या लिखा है हाश्मी साब..
क्या आप मुझे सिखायेंगे ये उर्दू शेर-ओ-शायरी …मैं तो फिलवक्त थोड़े ही शब्द प्रयोग करता हूँ..बड़ी दिली तमन्ना है..इन्हें समझने की..सीखने की और इनपर अपनी कविता में अमल करने की………