महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi)
चमन उजड़ा हुआ था मुज्महिल थी हर कली जिस दम
सरापा दर्द थी वक्फे अलम थी जिंदगी जिस दम
हुकूमत देश पर कायम थी मगरिब के दलालों की
कोई वक़अत न थी दुनिया में हिंदुस्तान वालों की
दरो दीवार बर्बादी का अफसाना सुनाते थे
असीराने क़फ़स रोते थे ज़ालिम मुस्कुराते थे
सितम ईजाद हर ताज़ा सितम हर रोज़ ढाते थे
नए तूफ़ां उठाते थे नए फितने जगाते थे
बिल आख़िर दर्दमंदाने वतन में कुछ को जोश आया
जवां उट्ठे कफ़न बांधे हुए बूढों को जोश आया
उन्ही जांबाज़ इंसानों में गाँधी जी भी शामिल थे
तमन्नाओं का मरकज़ थे वह उम्मीदों का हासिल थे
वतन के रहनुमा थे नाखुदा थे खिज्रे मंजिल थे
वो यकताए ज़माना थे वो अपने फन में कामिल थे
वतन के दुश्मनों से वो बड़ी जुर्रत से टकराए
वो अपने वक्त की सब से बड़ी ताक़त से टकराए
उन्ही के दम से आज़ादी के नेमत हम ने पाई है
शबे तारीक, नूरानी फ़ज़ा से जगमगाई है
मजदूर ( LABOUR )
यह मेहनत कश मजदूर नहीं अनमोल रत्न हैं भारत के
गर्मी से इनके इरादों की फौलाद पिघलने लगता है
एक जुम्बिशे अबरू पर इनकी हर सांचा ढलने लगता है
इन के ही भरोसे हर सनअत का काफ्ला चलने लगता है
और देश का नक्शा इनकी ही कोशिश से बदलने लगता है
यह मेहनत कश मजदूर नहीं अनमोल रत्न हैं भारत के
सैलाब में किश्ती खेते हैं तूफानों से टकराते हैं
हो राह में चाहे कोहेग्रां यह आगे बढ़ते जाते हैं
दुनिया में किसी भी मुश्किल से डरते हैं न घबराते हैं
पतझर के मौसम में भी यह फूलों के गीत सुनाते हैं
यह मेहनत कश मजदूर नहीं अनमोल रत्न हैं भारत के
(फौलाद : लोहा, सनअत: धंधा ,किश्ती: नाव, कोहेग्रां: मुश्किलों का पहाड़ ),
कौन सा जज़्बा है ?
इलाही कौन सा जज़्बा है इन नाज़ुक से फूलों में
यह उन हाथों को महकाते हैं जो इनको मसलते हैं
तमन्नाओं की महफिल
कौन गुज़रा है तमन्नाओं की महफ़िल के क़रीब
आज क्यों होती है रह रह के कसक दिल के क़रीब
राह्बर आप अगर हैं तो ख़ुदा खैर करे
कारवां ही कहीं लुट जाए न मंजिल के क़रीब
बच गए शोरिशे तूफां से मगर होश रहे
डूब जाते हैं सफीने कभी साहिल के क़रीब
डूबने से मुझे औरों ने बचाया तो सही
आप तो महवे तमाशा रहे साहिल के क़रीब
अहले दिल तल्खि़ये अंजाम पे रो देते हैं
मुस्कुराते हैं जहाँ फूल अनादिल के क़रीब
मुस्कुराया हूँ मैं हर एक परेशानी पर
हौसले और बढ़े जादए मुश्किल के क़रीब
जज़्बये इश्को़ वफ़ा आज उन्हें ले आया
पुरसिशे ग़म के लिए साहिर बिस्मिल के क़रीब
नादान
पहले देखो है लिखा क्या मेरे अफसाने में
तुम तो आ जाते हो हर शख्स के बहकाने में
तुम अभी आए हो आते ही यह जाना कैसा
चंद लम्हे तो ठहेरते मेरे गम खाने में
तुम को मालूम भे है , तेरे असीराने सितम
आफिअत अपनी समझ बैठे हैं मर जाने में
लोग बरहम नज़र आते हैं खुदा खैर करे
मुझ से क्या कोई खता हो गयी अनजाने में
सब को यकसां मिले पीने को , बहुत मुश्किल है
कारफर्मा है सियासत अभी मैखाने में
सिर्फ़ कहने के लिए नामे ख़ुदा है लब पर
सैकड़ों बुत हैं अभी दिल के सनम खा़ने में
वाइजो़ शैख़ न सुधरेंगे कभी ऐ साहिर
वक्त ज़ाया न करो तुम इन्हें समझाने में
ख़ुदा की बातें ख़ुदा ही जाने
कोई है शादाँ किसी को है ग़म, ख़ुदा की बातें ख़ुदा ही जाने
कहीं पे खुशयां कहीं पे मातम, ख़ुदा की बातें ख़ुदा ही जाने
जहाँ पे गुंचे चटक रहे है जहाँ पे गुल मुस्कुरा रहे हैं
वहीं पे रोती है रोज़ शबनम, ख़ुदा की बातें ख़ुदा ही जाने