महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi)
चमन उजड़ा हुआ था मुज्महिल थी हर कली जिस दम
सरापा दर्द थी वक्फे अलम थी जिंदगी जिस दम
हुकूमत देश पर कायम थी मगरिब के दलालों की
कोई वक़अत न थी दुनिया में हिंदुस्तान वालों की
दरो दीवार बर्बादी का अफसाना सुनाते थे
असीराने क़फ़स रोते थे ज़ालिम मुस्कुराते थे
सितम ईजाद हर ताज़ा सितम हर रोज़ ढाते थे
नए तूफ़ां उठाते थे नए फितने जगाते थे
बिल आख़िर दर्दमंदाने वतन में कुछ को जोश आया
जवां उट्ठे कफ़न बांधे हुए बूढों को जोश आया
उन्ही जांबाज़ इंसानों में गाँधी जी भी शामिल थे
तमन्नाओं का मरकज़ थे वह उम्मीदों का हासिल थे
वतन के रहनुमा थे नाखुदा थे खिज्रे मंजिल थे
वो यकताए ज़माना थे वो अपने फन में कामिल थे
वतन के दुश्मनों से वो बड़ी जुर्रत से टकराए
वो अपने वक्त की सब से बड़ी ताक़त से टकराए
उन्ही के दम से आज़ादी के नेमत हम ने पाई है
शबे तारीक, नूरानी फ़ज़ा से जगमगाई है
mehek said,
December 25, 2007 at 6:12 am
he was a great man,beautiful poem
Devi Nangrani said,
January 15, 2008 at 3:58 am
Wwwwwahhhhhhhhhhhhhh!!!
उन्ही के दम से आज़ादी के नेमत हम ने पाई है
शबे तारीक, नूरानी फ़ज़ा से जगमगाई है
न बस में हो अगर हालात मजबूरी के आलम में
कफ़स में क़ैद पंछी जैसे कोई छटपटाया है.
Is uttam sher ke liye jitni daad doon utni kam hai
Devi Nangrani