ईद: बेवायें, पड़ोसी और यतीम

December 17, 2007 at 10:37 am (Uncategorized) (, , , , , , , , , , , )

                अब न वो रौनक़, न वो जाहो जलाले ईद है
                अज़मते रफ़्ता का शाहिद ख़ुद हिलाले ईद है
भूल कर शिकवे गिले,हर इक गले मिलने लगा
जुड़ गए टूटे हुए दिल , यह कमाले ईद है
               गमज़दों को ईद के दिन भी नही मिलता सुकूं
               अहले इशरत का तो हर एक दिन मिसाले ईद है
याद हैं क्या तुमको बेवायें, पड़ोसी और यतीम
ईद के शैदाइयों से यह सवाले ईद है  
               काश आ जाए युंही अपने फ़राएज़ का ख्याल
               जिस तरह हर फरदे मुस्लिम को ख़्याले ईद है
उँगलियाँ साहिर की नब्जे वक्त पर है, और ग़ज़ल
हस्बे हाल-ए वक्त है और हस्बे हाल-ए ईद है

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अब आ भी जाओ

December 14, 2007 at 9:56 am (Uncategorized)

ज़ख़्मे दिल बन गए नासूर अब आ भी जाओ
रो दिया है कोई मजबूर अब आ भी जाओ

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